Monday, June 14, 2021
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मेजर सोमनाथ शर्मा जिन्होंने टूटे हाथ से जंग लड़ बचाया था कश्मीर

HIMACHAL NAZAR | देश के पहले परमवीर चक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा हैं। यह तो आप जानते ही होंगे। सोमनाथ शर्मा हिमाचल के रहने वाले थे यह भी आप जानते होंगे, लेकिन बहुत कम लोग ही जानते होंगे की आज यानी 3 नवंबर, 1947 को उन्होंने फ्रैक्चर हाथ से जंग लड़ी। श्रीनगर को पाकिस्तान के कब्जे में जाने से बचाया और देश की रक्षा करते हुए शहादत दे दी। सेना हेडक्वार्टर में जब उनकी बात हुई तो उनके आखिरी शब्द यह थे…

भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुए अढ़ाई महीने से ज्यादा समय हो चुका था। पाकिस्तान छद्म युद्ध यानि प्रोक्सी वॉर के जरिए कश्मीर हथियाने में लगा हुआ था। इस बीच सेना को खुफिया जानकारी मिली की बड़ी तादाद में पठान जिन्हें पाकिस्तान आर्मी ने भेजा और हथियार दिए हैं श्रीनगर बढ़ रहे हैं। सेना भेजने की तैयारी हुई, मेजर सोमनाथ शर्मा हॉकी खेलते हुए चोटिल हो गए थे। उनके हाथ में फ्रैक्चर था। इसके बावजूद उन्होंंने कहा कि वह जाएंगे।

चार कुमाऊं की ए और डी कंपनी को श्रीनगर के साथ लगते बड़गाम के लिए रवाना किया गया। इसकी कमान मेजर सोमनाथ शर्मा के हाथ थी। साथ ही एक पैरा कमाऊं भी बड़गाम भेजी गई, जिसकी कमान संभाल रहे थे कैप्टन रोनाल्ड वुड। सेना की सूचना के अनुसार अगर पाकिस्तान समर्थित पठान अपनी चाल में कामयाब रहते तो श्रीनगर एयर बेस और घाटी में वह कब्जा कर लेते। ऐसा होता तो भारतीय सेना के लिए हवाई मदद के रास्ते बंद हो जाते और पाकिस्तान बहुत से क्षेत्र पर कब्जा कर लेता।

तीन नवंबर की सुबह सेना ने मोर्चा संंभाला। स्थिति सामान्य थी इसलिए एक पैरा कमाऊं को श्रीनगर एयरबेस वापसी के निर्देश मिले। मेजर सोमनाथ शर्मा को भी आदेश दिए गए कि वह अपनी कंपनी वहां से हटा लें, लेकिन उन्होंने शाम तक कंपनी को बड़गाम में ही रखने का फैसला लिया। दो बजे जैसे ही 4 कुमाऊं की ए कंपनी वहां से चली गई। आधे घंटे बाद ही पाकिस्तान की ओर से भेजे गए पठानों ने गोलाबारी शुरू कर दी।

मेजर सोमनाथ शर्मा हक्के-बक्के रह गए कि गांव की तरफ से फायर हो रही है। उन्होंने तुरंत अधिकारियों को सूचित किया और कहा यदि वह जवाबी हमला देते हैं तो गांव की औरतों और बच्चों का क्या होगा। अब स्थिति ऐसी आ चुकी थी की करीब 700 घुसपैठिए सेना को तीन जगह से घेर चुके थे। यह पाकिस्तान की ओर से सोची समझी और खतरनाक साजिश थी।

700 पाकिस्तानी घुसपैठियों से लोहा लेना सेना के 90 जवानों के लिए मुश्किल था। मेजर सोमनाथ शर्मा जानते थे कि मदद आने में कम से कम छह घंटे लग सकते हैं। उतनी देर तक उन्हें मुहं तोड़ जवाब देना ही होगा। नहीं तो श्रीनगर एयरबेस और घाटी में आतंकी कब्जा कर लेंगे। मेजर शर्मा ने लड़ाई के बीच ही एक बंकर से दूसरे बंकर भागना शुरू किया और जवानों के बीच जोश भरते रहे।

हाथ चोटिल होने के बावजूद वह सैनिकों बंदूक रिलोड करने में भी मदद कर रहे थे। पांच घंटों तक मेजर सोमनाथ शर्मा की कंपनी ने पाकिस्तानी घुसपैठियों को रोके रखा। जवानों के पास जब एक या दो राउंड की गोलियां ही बची थीं तो उन्होंने यह कहते हुए सैनिकों में जोश भर दिया कि अगली कार्रवाई के लिए तैयार हो जाओ। इतना समय काफी था सेना की मदद पहुंचने के लिए।

सेना पहुंची और पांच नवंबर तक सभी पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ दिया गया, लेकिन बड़गाम युद्ध में मेजर सोमनाथ शर्मा सहित 20 जवानों ने देश के लिए प्राण न्यौछावर कर दिए। सोमनाथ शर्मा का शव तीन दिन बाद मिला। मेजर सोमनाथ शर्मा के इस पराक्रम और चतुराई के लिए उन्हें परमवीर चक्र से नवाजा गया जो देश का सबसे पहला परमवीर चक्र था।

अगली कड़ी में हम आपको बताएंगे सोमी से मेजर सोमनाथ तक का सफर

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