Wednesday, August 4, 2021
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कस्तूरी 20 साल से बच्चों के दीदार के इंतजार में… आप जानते हैं इनके बच्चों को?

HIMACHAL NAZAR |पिछले कल बैंक जाना हुआ तो वहां पहुंच कर याद आया कि विद्या की व्यथा पढ़कर बहुत सारें लोगों ने विद्या की हैल्प करने हेतु हाथ आगे बढ़ाया था , कुछ ने एकाऊंट नम्बर भी मांगा था , मैंने परिषद का अकाउंट नम्बर दिया था , सो कल सोचा कि चैक कर लूं , अगर किसी ने पैसे भेजें हों तो वो अर्थ में लगें । मैंने बैंक बाबू से चैक करने को कहा उन्होंने बताया कि पांच सौ, सौ और पचास कुल मिलाकर छह सौ पचास रुपये आये हैं ।

मैंने मन ही मन पैसे भेजने वालों का शुक्रिया किया और सोच में पड़ गया कि इन पैसों का क्या किया जाये , विद्या तो अब रिश्तेदारों के पास पहुंच चुकी है । क्या करुं – क्या करुं सोचते-सोचते मैं घर पहुंच गया । सवाल दिमाग में रहा – मैं सो गया ।सुवह उठा तो फिर सोचा , तभी कस्तूरी की शक्ल और उसका ठिकाना सामने आ गया । कस्तूरी की याद आते ही सोचों को दिशा मिली और मैं जल्दी से तैयार होकर कस्तूरी के पास पहुंचने को ललायित हो उठा ।

Posted by Durgesh Nandan on Tuesday, November 5, 2019
दुर्गेश नंदन कस्तूरी से बातचीत करते हुए

स्कूटी लेकर जब मैं चम्बी में कस्तूरी के ठिकाने जफे दे ढाबे पर पहुंचा तो कस्तूरी ढाबे के पीछे बैठ धूप सेंकती,हाथों में बीड़ी सुलगाये दूर पहाड़ की ओर एकटक देखे जा रही थी ।

मैंने जफे को चाय बनाने के लिए कहा और कस्तूरी की ओर बढ़ गया ।
कस्तो हो कस्तूरी ? मैंने पूछा ।

रामरो छ – बीड़ी दूर फैंकते बोली कस्तूरी ।

कस्तूरी मुझे तुम्हारी सोने की जगह देखनी है ।

कस्तूरी पहले तो न नुकर करती रही , फिर बोली – वो सामने है ।

चलो ।

चलने से पहले मैं सोचने लगा , चम्बी के इस सुनसान इलाके में जहां बड़े-बड़े भी रात के वक्त अकेले आने -जाने,गुजरने से डरते हैं वहां घुप्प अंधेरे में यह अकेली कैसे रहती होगी ।

कस्तूरी मुझे पास बने स्टोर की ओर ले गई । वहीं कस्तूरी का विस्तर लगा हुआ था -खिंद थी , एक दोह्ड़ भी थी , एक कम्बल था , लेकिन सब उल्ट- पुल्ट पड़े हुये थे । कमरे में पंखा लगा था पर बिजली की तार और बल्ब गायब था , धुप्प अंधेरा था ।

मैंने मन ही मन कुछ निश्चय किया और बाहर आ गया । जफा चाय लेकर वहीं आ गया , एक कप कस्तूरी को देकर , दूसरा हाथ में पकड़ , मैं ढाबे में जाकर बैठ गया । चाय पीते – पीते मैंने जफे से कहा- कस्तूरी के कमरे की बिजली चालू करनी है अभी के अभी , यहां से कनैक्शन मिल जायेगा ।

मिल जायेगा भाई जी – मिल जायेगा – कस्तूरी के लिए कुछ भी ।

तभी सर्विस स्टेशन वाला विजय भी वहां आ गया – कस्तूरी वारे बातें होने लगी ।

कस्तूरी लगभग बीस – बाईस साल पहले चम्बी पहुंची थी किसी ट्रक में । तब पीनू चम्बी में ढाबा किया करता था । इसने आते ही चाय की डिमांड की और पूछा था – काम मिलेगा ?
पीनू दलेर था – उसने इसे खाना खिलाया और घर -वार ‘, अता-पता पूछकर इसे ढाबे पर रख लिया । तब से यहीं है । पीनू जब गंभीर बीमार हो गया तो उसने पास बना कमरा कस्तूरी को दे दिया और जफे को इसी शर्त पर ढाबा दिया कि कस्तूरी को काम देगा और उसके खाने-पीने का ख्याल रखेगा।

यहां रहती है कस्तूरी

पीनू के न रहने पर कस्तूरी कुछ दिन उदास रही , कुछ दिन अजय के पास भी काम किया , फिर यहीं जफे के ढाबे की होकर रह गई ।

चाय खत्म हुई तो मैंने विजय को कहा कि मेरे साथ स्कूटी पर रैत तक चलो कस्तूरी के लिए विस्तर और बिजली का सामान लाना है । विजय तैयार हो गया और हम स्कूटी पर बैठ पहले बिजली की दुकान फिर रजाई की दुकान पर पहुंचे और सामान खरीदा । वहां दुकान पर कुछ समय मिला तो मैंने विजय से पूछा – आप तो तीस साल से चम्बी में हो । कस्तूरी वारे कुछ बताओ ?

उसने जो बताया उसके अनुसार कस्तूरी नेपाल से दिल्ली , दिल्ली से चम्बा किसी प्रोजेक्ट में अपने परिवार के साथ पहुंची थी । घरवाला साथ था , दो लड़कियां भी । वे तीनों प्रोजेक्ट में दिहाड़ी पर लग गये यह किसी दुकान पर काम करने लगी । फिर पता नहीं क्या हुआ , यह यहां चम्बी पहुंच गई ।

घरवालों का अता -पता ?पीनू ने भी पूछा था । यह चम्बा -चम्बा करती थी । एक वार पीनू और मैं इसे साथ लेकर चम्बा के सारे प्रोजेक्टों के आस-पास घूम आये पर कोई न मिला ।

उसके बाद एक वार यह खुद ही पैदल कहीं चली गई थी । पीनू बड़ा परेशान हुआ – सब जगह ढू़ढा – मटौर के पास मिली थी । तब से कहीं नहीं गई । विजय से इतनी बातें पता लगीं तो मुझे कस्तूरी का दुख अनुमान से कहीं ज्यादा बड़ा लगा । सामान पैक हो गया था , हम लेकर चम्बी लौट आये ।

हमें काम करता देख वहां वर्कशाप चलाने वाले लड़के भी काम करने लग पड़े । कुछ ही पलों में कमरा साफ हो गया, लाईट लग गई , विस्तर लग गया । जब बिजली का बल्ब जगा तो कस्तूरी मुस्कुराई ।

मैंने उसे बुलाया विस्तर पर विठाया और कुछ सोच कर कैमरा आनकर कस्तूरी से बातें करने लगा । मैंने उससे उसका नाम पूछा तो उसने बताया – मेरा नाम कस्तूरी नहीं , विष्णो देवी है । कस्तूरी नाम तो मुझे चम्बी ने दिया । मैंने दो चार बातें और पूछी और फिर उससे उसकी लड़कियों वारे पूछा -तो पहाड़ की ओर ईशारा करते बोली कस्तूरी – एक इस ओर रहती है , दूसरी उस ओर रहती है ।
मिलना है उनसे ? मैंने पूछा तो नेपाली भाषा में बोली कस्तूरी – बाटो नहीं मिलता अर्थात रास्ता नहीं मिलता ।

कस्तूरी के साथ दुर्गेश नंदन जी

रास्ता है कस्तूरी यह वीडियो, यह फोटो रास्ता है , सब जगह भेजेंगे , सब जन तेरी पीड़ा समझेंगे , क्या पता फारवर्ड करें और चलते-चलते यह बात तेरी बेटियों तक पंहुच जाये और वो तुझे पहचान यहां तक पहुंच जायें । मेरी बातें सुनकर कस्तूरी दूर देखने लगी, आंखों में आंसू आ गये । मेरा भी गला रुंध गया । मैंने कैमरा आफ किया और भारी मन से कमरे से बाहर निकल आया । कुछ देर बाद मैंने फिर कमरे में झांककर देखा तो कस्तूरी आंसू पौंछ रही थी ।

जफा मेरे पास आकर बोला – इसे कभी रोता नहीं देखा था , आपने इसे रुला दिया और खुद भी । मैं वहां से टला और फिर कस्तूरी के कमरे की ओर बढ़ गया । उसे बाहर बुलाया और जफे को चाय बनाने को कहा यही सोचकर की कि कस्तूरी चाय खूब पीती है । जो चाय पिलाये उससे बतियाती भी है । चाय पीते-पीते मैंने कस्तूरी से पूछा – कस्तूरी तेरी बेटियों के नाम क्या हैं ?

एक का लक्ष्मी और दूसरी का सिरजाना । उम्र कितनी है ? कस्तूरी उंगलियों पे हिसाब लगाने लगी – बड़ी देर गिनती रही , फिर बोली – अभी का पता नहीं – उस वक्त एक बीस साल की थी एक सोलह की । अगर बेटियां मिल गईं तो ? क्या करेगी ? चली जायेगी या ? कहां मिलेंगी ? कौन मिलवायेगा ? कहती – आंखों से आंसू छलकाती चाय का गिलास उठा कर धूप की ओर निकल गई कस्तूरी ।

चलता हूं जफे भाई । मैं कस्तूरी वारे लिखूंगा । क्या पता कस्तूरी की बात कस्तूरी की बेटियों तक पहुंच जाये और मधुर मिलन हो जाये । और हां आप भी शेयर करना ।

ज़रुर करेंगे जी ! ज़रूर करेंगे -बोला जफा भाई ।

वहां से विदा लेकर जब मैं स्कूटी लेकर सड़क की ओर बढ़ा तो देखा , हाथ हिलाती , मुस्कुराती कस्तूरी आशा भरी नज़रों से देख रही थी । मैं भी हाथ उठाकर जोर से बोल उठा – जय पशुपतिनाथ।

सुनकर खुलकर मुस्कुराई कस्तूरी और बोल पड़ी – जय माता की ।

यह कहानी दुर्गेश नंदन जी की फेसबुक वाल से ली गई है। आप भी उनकी मेहनत को सार्थक बना सकते हैं।

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