Saturday, October 23, 2021
Google search engine
HomeNewsCAA-NRC विवाद, बिना नागरिकता हिमाचल में जिंदगी खपा चुकी कस्तूरी|

CAA-NRC विवाद, बिना नागरिकता हिमाचल में जिंदगी खपा चुकी कस्तूरी|

HIMACHAL NAZAR | देश भर में सिटीजनशिप एमेंडमेंट एक्ट (CAA) और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस (NRC) को लेकर बवाल मचा हुआ है। हिमाचल फिलवक्त शांत है और विवाद से कोसों दूर है। हिमाचल में एनआरसी (NRC IN HIMACHAL PRADESH) या सिटीजनशिप एमेंडेमेंट एक्ट (CAA IN HIMACHAL PRADESH) को लेकर बवाल तो नहीं हुआ, लेकिन दुर्गेश नंदन ने अपनी फेसबुक वाल पर जो कहानी लिखी है उसे पढ़कर आप ये समझ सकते हैं कि देश भर में आखिर बवाल मचा क्यों है? क्यो एनआरसी जरूरी है? और किसे नागरिकता मिलनी चाहिए थी।

क्या कस्तूरी को नागरिकता मिल सकती है

आज ब्लाक डेवलपमेंट आफिस में एक काम के सिलसिले में पहुंचा तो संबंधित अधिकारी से पता चला कि कागज़ अधूरे हैं , पूरे करने पड़ेगें । और एक परफार्मा देकर कहा कि यह भरना पड़ेगा । इस पर सब पदाधिकारियों के साईन होंगे, फिर सुपरिटेंडेंट साहब चैक करेंगे, डिस्पेच नम्बर लगेगा, फिर साहब के साईन होंगे , उसके बाद आपका काम होगा । सारी बातें समझकर मैं घर लौटा । फादर साहब से सारी बात बताई , मोहर आदि लगवाकर ,साईन करवाकर , विकास समिति सदस्यों के पास गया और उनके हस्ताक्षर लेकर कागज़ पूरे करवाकर लंच बाद फिर ब्लाक जा पहुंचा ।

संबंधित अधिकारी ने सारे कागज़ चैक किये और ठीक है कहकर , हस्ताक्षर कर , डिस्पेच नम्बर लगवाकर कागज़ बी. डी. ओ. साहब के पास पेश किया , बी. डी. ओ. साहब ने बारीकी से सारी फाईल चैक की , एक- एक पन्ना देखा , जे. ई. साहब से एक दो सवाल पूछे, फिर संबंधित कागज़ बारीकी से देखे फिर साईन कर दिये । फाईल से निपटने के बाद वे मुझसे मुखातिब हुये और कहा कि डा. व्यथित की किताबें पढ़ी है मैंने , वे मिले थे मुझसे । मैंने उन्हें अपना परिचय दिया , मंदिर विकास संबंधी दो-चार बातें कीं, नेरटी आने का , लाईब्रेरी, मंदिर परिसर, थियेटर देखने का न्यौता दिया और उनके कीमती समय को समझता , क्योंकि बाहर और भी लोग थे मिलने वाले , अभिवादन कर बाहर आ गया ।

पौने तीन बज चुके थे। ठंड बढ़ रही थी , चलो चम्बी चलकर घियाना भी सेंक आता हूं , चाय भी पी आऊ़गा , कस्तूरी का हाल-चाल भी पता चलेगा, सोचकर मैंने स्कूटी चम्बी की ओर मोड़ दी ।

चम्बी पहुंचा , जफे के ढाबे पर गया , कस्तूरी वहीं थी , बस स्टैंड जा रही थी होटल का सामान लाने।

मैंने पूछा – कस्तो कस्तूरी ?
रामरो ।
चाय पीयेगी ?
अभी पीया, उसने हाथ में पकड़ा खाली गिलास दिखाया ।

जाओ कस्तूरी , जल्दी से मीट ले आओ । अच्छा-अच्छा लाना । अच्छा नहीं देगा तो उसको बोलना – अच्छा नहीं दोगे तो कहीं और ले लेंगे , बड़ी दुकानें हैं । सब बाते समझाकर , जफे ने कस्तूरी को पेसे दिये और भेज दिया ।

कस्तूरी के जाने के बाद जफा बोला – बाबू जी , शिमले से तीन आदमी आये थे किसी आफिस से । कस्तूरी के वारे में पूछ रहे थे । यह तब यहां थी नहीं । मैंने उनसे बात की । उन्होंने बताया कि हम कस्तूरी के रहने आदि का इंतजाम करने आये हैं । मैंने उन्हें बताया कि कस्तूरी कहीं नहीं जाना चाहती , यहीं रहना चाहती है । पहले भी हास्टल ले जाने की बात की थी आपने , तो आपसे भी डरने लगी थी ।

यह तो है – जफे की बात सुनकर बोला मैं ।

बाऊ जी , यह नया कानून बना है , इससे कस्तूरी का फायदा नहीं हो सकता क्या ? जफे ने मुझसे पूछा ।

हम बातें कर ही रहे थे कि जिम्मी ठाकुर वहां पहुंचा , उसने हमारी बातें सुनी तो कहा – भाई कस्तूरी का अगर आधार कार्ड वगैरह बन जाये तो पैंशन – वैंशन लग सकती है ।

शिमले वाले भी यही कह रहे थे -जफा बोला ।

उनका कोई नम्बर ?

है , अपना कार्ड दे गये थे , कहकर जफे ने डिब्बे के नीचे से कार्ड निकालकर मुझे थमा दिया । मैंने कार्ड पर नाम पढ़ा – अनुराग शर्मा , एडवोकेसी कंसल्टेंट , हैल्पेज इंडिया , शिमला ।

हैल्पेज इंडिया का नाम , मैंने सुन रखा था , फोन नम्बर मैंने नोट कर लिया यही सोचकर कि घर पहुंचकर फोन करूंगा ।

बाऊ जी , कुण फर्म है ?

बड़ी संस्था है । कस्तूरी की कहानी सही जगह पहुंच गई है , इसे ठिकाना मिल जायेगा ।

बाऊ जी , ठिकाना यह भी तो है , इसे ही ठीक करवा दो , यह कहीं नहीं जाना चाहती । तीस- बतीस साल तो हो गये । अभी नया कानून बना है । यह भी तो हिन्दू है । नेपाली हिन्दू । आप कुछ लिखो । इसका आधार कार्ड, पैंशन वगैरह लगवाओ ।

नेपाली हिन्दू और नागरिकता सुन मेरी सोचें कहीं की कहीं पहुंच गईं।चाय के पैसे चुका , मैं घर की ओर लौट आया । कस्तूरी दिमाग में रही । जैसे ही समय मिला , मैंने वो कार्ड वाला नम्बर डायल कर दिया । उधर से आवाज़ आई तो मैंने कार्ड पर लिखा नाम कहा तो बताया गया कि मैं अनुराग ही बोल रहा हूं ।

मैंने उन्हें कस्तूरी वारे याद दिलाया तो उन्होंने कहा कि हमारे हैड आफिस से हमें कस्तूरी वारे सारी जानकारी लेने को कहा गया था , उसी सिलसिले में चम्बी आया था मैं । कस्तूरी ढाबे पर तो मिली नहीं पर बाद में सड़क पर मिल गई थी । ढाबे वाले ने हमें बताया था कि कस्तूरी कहीं नहीं जाना चाहती । यहीं रहना चाहती है । हमें मिली तो हमने उसको समझाया पर न की उसने । पर हमें लगता है कि एक दो साल जब तक वो स्मर्थ है तब तक तो ठीक , पर बाद में कौन देखभाल करेगा कस्तूरी की । यूं भी वो जहां सोती, रहती है , वो जगह वियावान और । आप कस्तूरी की काउंसलिंग करियेगा, उसे समझाईयेगा ताकि वो शैल्टर होम में रहने को मान जाये ।

मैं कोशिश करूंगा ।

जी हमने पहले भी बहुत से नेपालियों को शैल्टर होम तक पहुंचाया है , वे यहां आये, प्रोजेक्टों में. सड़कों के काम में, बगीचों में काम करते रहे । जवानी खपा दी , बूढ़े हो गये तो न इधर के रहे न उधर के । आप कस्तूरी की काऊंसलिंग कीजिएगा ।

जी मैं करूंगा । अपनी बात कहकर मैंने फोन बंद कर दिया ।

दिमाग में अब और भी सवाल थे जब से यह सुना कि और देखा भी तो है —

प्रोजेक्टों में काम करते नेपाली ।
सड़क बनाते नेपाली ।
बिल्डिंग बनाते नेपाली ।
ऊंचे-ऊंचे टावर फिट करते नेपाली ।
पहाड़ियों पर चढ़ते नेपाली ।
सुरंगें बनाते नेपाली ।
चाय बगीचों में काम करते नेपाली ।
शहर दर शहर किराये की दुकाने लेकर चोमिन मोमो की दुकान चलाते, हमें नेपाली, चाईनीज भोजन करवाते नेपाली ।

कुछ तो अभी आये हैं , कुछ कई दशकों से यहीं रह रहे हैं , बूढ़े हो गये हैं जिन्होंने अपनी जवानी यहीं खपा दी , देश निर्माण में जिनका बराबर योगदान रहा , क्या उनको नागरिकता ?

सरकार की ओर से कहा गया है कि अल्पसंख्यकों का भी नागरिकता कानून में ख्याल रखा जायेगा ।

क्या कस्तूरी ?

नागरिकता ।? क्या हो सकता है । नेपाली हिन्दू क्यों नहीं ?

सवाल बढ़े तो मैंने दैनिक जागरण के राज्य सम्पादक भाई नवनीत शर्मा जी को फोन मिलाया और कस्तूरी वारे बताया और कहा कि क्या इस बात पर लिखा जाये ? क्या कस्तूरी जैसों की बात आगे तक पहुंच सकती है ।

उन्होंने कहा – लिखिये ।

कस्तूरी के बच्चों तक कस्तूरी की बात नहीं पहुंच पाई । पर देखिये दिल्ली तक पहुंच गई । और दिल्ली से शिमला और फिर कस्तूरी तक हैल्पेज इंडिया के लोग आ पहुंचे ।

कस्तूरी को मैं समझाने का प्रयास करूंगा । उसे शेल्टर दिलवाने का प्रयास करता रह़ूगा । पर यह बात भी मन में है कि कस्तूरी जैसे नेपाली मूल के हिन्दू लोग जो पिछले तीस- चालीस वर्षों से यहीं इंडिया में रच- बस गये हैं, जीवन यापन में लगे हैं , देश बनाने में लगे हैं , अगर उनको भी नागरिकता मिल जाये तो –?

अगर मैं सही सोच रहा हूं तो बात को आगे बढ़ाईये और कोई मार्गदर्शन हो तो कीजिए । कस्तूरी की कहानी तो पढ़ी ही होगी आपने । नीचे कमेंट वाक्स में लिंक दे रहा हूं , पढ़ियेगा , आपको पता चलेगा , कस्तूरी का असली नाम विष्णो देवी है जो तीस -चालीस साल पहले इंडिया रोजगार की तलाश में आई, परिवार से बिछुड़ गई और इंडिया की होकर रह गई ।

नीचे क्लिक कर पढ़ें कस्तूरी की कहानी……

RELATED ARTICLES
- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments

error: Content is protected !!