Tuesday, June 28, 2022
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शादियों में बरोट के इस गांव से सीख ले सकता है हिमाचल

HIMACHAL NAZAR – एक दौर था जब हिमाचल में खासकर गावों में किसी शादी-समारोह के लिए सभी लोग इक्ट्ठे होते थे। गांव के लोग छोटे से छोटे और बड़े से बड़े काम में हाथ बंटाते। चाहे बात शादी के लिए लकड़ी काटने की हो या शादी के समय या बाद में काम करने की। घर से दूर रहने वाले रिश्तेदार भी समारोह से कुछ दिन पहले पहुंच जाते और फंक्शन निपटने के बाद भी डटे रहते और सब काम आसानी से निपट जाते। लेकिन आज ऐसा नहीं है।

बरोट का जलाशय

किसी भी घर में कोई समारोह होता है तो काम करने वाले युवा आज नदारद ही रहते हैंं। कोई पढ़ाई के लिए घर से बाहर गया है तो कोई नौकरी कर रहा है। रिश्तेदार भी पहुंचते हैं तो आते ही जाने के बहाने पहले ही बयान करते हैं। इस भाग दौड़ में दुल्हन की तरह रिश्तेदारों का भी मुहं दिखाई जैसा हाल हो चुका है। जिस घर में शादी या कोई दूसरा बड़ा समारोह है वहां किराए पर काम करने वाले लोग बुलाने पड़ते हैं। अब हर काम पैसे से हो नहीं सकता इसलिए जिस बरोट के एक गावं की बात हम बताने जा रहे हैंं वहां से बहुत कुछ सीखने जैसा है।

चूल्हे में लकड़ी आंच पर पकती रोटी

अधिकतर लोग जानते हैं कि बरोट एक पर्यटन स्थल है। यहां करीब 100 साल पुराने शानन पावर हाउस के लिए बनाया गया रेज़रवायर है जो आकर्षण का केंद्र रहता है। बरोट से करीब एक किलोमीटर दूर गावं है कहोग। कहोग गावं की खासियत है कि किसी विवाह बंधन में बंधने जा रहे लड़के या लड़की के घर रोटी (फुल्का या चपाती भी कहते हैं कई जगह) नहीं बनती बल्कि रोटी, गावं के सभी घरों में बनाई जाती है और फिर रोटियां समारोह वाले घर पहुंंचती हैंं।

रोटियां लेने से पहले चैक की जाती हैं कि पूरी तरह से पक चुकी हैं या नहीं।अगर किसी घर से रोटियां थोड़ी अधपक्की आती हैं तो उन्हें लौटा दिया जाता है और वे फिर से उन्हें रोटियां पकाई जाती हैंं। रोटी के लिए आटा गांव वाले अपना आटा इस्तेमाल नहीं करते हैंं। शादी वाले घर से आटा दिया सभी को दिया जता है।

तस्वीर में बाईं तरफ सबसे ऊपर जो घर दिख रहे हैं वही है कहोग गांव

गांव के कुछ लोग बताते हैं कि एक समय समारोह में काम करने के लिए लोगों की कमी होने लगी। ऐसे में सभी ने फैसला किया कि काम बांटने के लिए शादी समारोह में यह प्रचलन शुरू किया जाएगा। यह प्रचलन चौहारघाटी के करीब-करीब सभी गावोंं में है। चौहार घाटी मंडी जिला की एक प्रसिध घाटी है। हालांकि कहोग गावं के लोग दावा करते हैं कि यह प्रथा उनके गावं से ही शुरू हुई थी।

फायदे भी बुहत हैंं। इस प्रचलन के फायदे यह है कि काम जब पूरे गावं में बटेगा तो मेहनत कम लगेगी और काम जल्द पूरा होगा। गावंवासियों के बीच भाईचारा की भावना अच्छी बनी रहेगी और सबसे बड़ा फायदा कि जन सहभागिता की जो बात सरकारें किसी भी बात के लिए करती है। इस गावं को सहभागिता के लिए उदाहरण के तौर पर पेश किया जा सकता है।

अगर आपके पास भी किसी गावं के अच्छे या बुरे प्रचलन के बारे में जानकारी है तो हमें बताएं और आपका यह प्रथा कैसी लगी इसके बारे में भी कम्मेंट करें।

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