Tuesday, June 28, 2022
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हिमाचल में वीरभद्र-धूमल के अलावा कितनी पोलीटिक्ल पीढ़ियों को जानते हैं आप ?

Himachal Nazar | राजनीति में परिवारवाद या वंशवाद कोई नई बात नहीं है। लोकसभा चुनाव बीत चुके हैं। चुनाव में परिवारवाद पर गाहे-बगाहे बयान आते रहे, लेकिन भाजपा और कांग्रेस परिवारवाद से अछूती नहीं है। हालांकि दोनों ही पार्टियों के मामले में सीधी बात यह है कि जनता ही उन्हें चुन कर विधनासभा या संसद भेजती है।


मौजूदा दौर के बहुत से युवा केवल वीरभद्र और धूमल राजनीतिक परिवारवाद को जानते होंगे, लेकिन क्या आप जानते हैं हिमाचल निर्माता डा. यशवंत सिंह परमार से लेकर आज तक किन-किन नेताओं ने अपने बेटे, बेटियों या बहुओं के हाथ अपनी राजनीतिक विरासत सौंपी और जिस पर जनता ने मुहर लगाई या नहीं। आइए आपको बताते हैं हिमाचल प्रदेश की पोलीटिक्ल डायनस्टी यानी राजनीतिक परिवारवाद की।

डा. वाईएस परमार व उनके पुत्र कुश परमार

सबसे पहले बात करते हैं हिमाचल निर्माता डाक्टर यशवंत सिंह परमार की। डा. यशवंत परमार की मौत के बाद उनके बेटे कुश परमार राजनीति में आए और पांच बार विधायक रहे। कुश परमार तीन मर्तबा नाहन विधानसभा और दो बार पांवटा सीट से विधायक चुने गए। 2012 में भाजपा के राजीव बिंदल से हारने के बाद उन्होंने संन्यास ले लिया। हालांकि वह बेटे को 2017 में टिकट दिलवाने चाहते थे, लेकिन टिकट न मिलने के बाद कुश परमार के बेटे ने भाजपा का दामन थाम लिया।

कौल सिंह ठाकुर व चंपा ठाकुर

मंडी जिला के द्रंग विधानसभा क्षेत्र से आठ बार विधायक रहे कांग्रेस के दिग्गज नेता कौल सिंह ठाकुर ने भी 2017 हिमाचल विधानसभा चुनाव में अपनी राजनीतिक विरासत आगे बढ़ाई। कौल सिंह की बेटी चंपा ने मंडी सदर सीट से चुनाव लड़ा। हालांकि पिता और पुत्री दोनों को ही चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। चंपा ठाकुर उस समय जिला परिषद अध्यक्ष भी थीं। कौल सिंह ठाकुर वर्ष 1977 में पहली बार जनता दल के टिकट पर विधायक बने थे। इसके अलावा वह 1982, 1985, वर्ष, 1993, 1998, 2003, 2007 और 2012 में कांग्रेस टिकट से विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए।

पंडित सुखराम, अनिल शर्मा और आश्रय शर्मा

किसी जमाने में हिमाचली सियासत की धुरी रहे पंडित सुखराम ने 1962 में पहली बार निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीते। 1967 में कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़ा। 1984 में सांसद बने, 1989 में भाजपा उम्मीदवार महेश्वर सिंह से सांसद का चुनाव हारे। 1991 में फिर चुनाव लड़ा और जीत के साथ ही संचार मंत्री का स्वतंत्र प्रभार मिला। 1996 में चुनाव लड़े और जीते। 1998 में हिमाचल विकास पार्टी बनाई और पार्टी ने चार सीटें जीतीं। 2003 में आखिरी चुनाव लड़ा और 2007 में संन्यास ले लिया। उनके बेटे अनिल शर्मा ने चार बार मंडी सदर सीट से विधनासभा का चुनाव लड़ा और जीते। 2019 लोकसभा चुनाव में उनका बेटा आश्रय शर्मा कांग्रेस की टिकट से सांसद का चुनाव लड़ा और करीब चार लाख वोट से हारे। दिलचस्प यह है कि आश्रय के पिता अनिल शर्मा भाजपा के विधायक और मंत्री थे, लेकिन बेटा कांग्रेस के लिए चुनाव लड़ रहा था।

पंडित संत राम की प्रतिमा व सुधीर शर्मा

सुधीर शर्मा धर्मशाला विधानसभा क्षेत्र से पूर्व मंत्री स्वर्गीय पंडित संत राम के बेटे हैं। सुधीर शर्मा बैजनाथ विधानसभा क्षेत्र से 2003 और 2007 में बैजनाथ तो 2012 में धर्मशाला विधानसभा से चुनाव जीत चुके हैं। उनके पिता स्व. पंडित संत राम पांच बार बैजनाथ सीट से विधायक का चुनाव जीते थे। उनकी अकस्मात मृत्यु के बाद उनके बेटे सुधीर शर्मा ने उनकी विरासत संभाली और जीते भी। 2017 में भाजपा के किशन कपूर से चुनाव हारे, लेकिन कांग्रेस के हाईकमान में सुधीर शर्मा की अच्छी सांठगांठ मानी जाती है।

कुंज लाल ठाकुर व गोबिंद सिंह ठाकुर

भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सस्दयों में से एक कुंज लाल ठाकुर दो बार हिमाचल में मंत्री रहे। तत्कालीन मुख्यमंत्री शांता कुमार ने उन्हें बागबानी मंत्री बनाया था। 1989 में दोबारा विधानसभा पहुंचे और फिर कैबिनेट मंत्री रहे। कुंज लाल जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्य भी थे और उन्होंने में पंजाब, जम्मू काश्मीर और हिमाचल में प्रचारक की अहम भूमिका भी निभाई। उनके बेटे गोविंद सिंह ठाकुर तीन बार विधायक का चुनाव जीत चुके हैं और हिमाचल प्रदेश की जयराम सरकार में वन एवं परिवहन मंत्री भी हैं। उन्होंने 2017 में मनाली विधानसभा क्षेत्र से जीत दर्ज की थी।

महेश्वर सिंह, कर्ण सिंह, आदित्य विक्रम सिंह

महेश्वर सिंह ठाकुर तीन बार विधायक रहे और सांसद भी रहे। 2012 के चुनावों में भाजपा से अलग हुए और हिमाचल लोक हित पार्टी बनाई। महेश्वर सिंह को छोड़ कोई अन्य उनकी पार्टी से नहीं जीत सका। उनके भाई कर्ण सिंह ठाकुर भी तीन बार विधायक रहे। बंंजार विधानसभा में कर्ण सिंह ने अपना परमप लहराया। कर्ण सिंह खुद तब आयुर्वेद मंत्री भी थे जब उनकी कैंसर के चलते मौत हो गई। 2017 के विधानसभा चुनाव में उनके बेटे आदित्य विक्रम सिंह को कांग्रेस ने टिकट दिया, लेकिन वह हार गए।

हिमाचल में परिवारवाद या वंशवाद का अगला चैप्टर अभी बाकि है..

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