जब विधानसभा में रेत लेकर पहुंच गए थे रुमित सिंह ठाकुर के दादा हरिदास

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Himachal Nazar । हिमाचल के पहले मुख्यमंत्री डॉक्टर यशवंत सिंह परमार की कैबिनेट में एक मंत्री थे- हरिदास। हरिदास ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे लेकिन लोगों के साथ उनका संपर्क और समस्याओं को उठाने का उनका तरीका गजब था। उनके पास जो भी फाइलें आती थीं, उनमें हस्ताक्षर करते समय वो अपना पूरा नाम लिखा करते थे। अगर वो किसी विषय से समहत होते तो लिखते थे- मान गए, हरिदास और जिस विषय से सहमत नहीं होते तो लिखते- नहीं माने, हरिदास।

एक बार तो हरिदास विधानसभा में मुट्ठीभर रेत लेकर पहुंच गए थे। उन्होंने कहा कि बिलासपुर और उसके आसपास के इलाकों की रेत सामान्य रेत नहीं है, इसमें कुछ खास बात है। उन्होंने मांग की कि इसकी जांच की जाए ताकि उद्योगों में इसका इस्तेमाल हो सके। उस समय कई लोग इस बात पर हंसे थे। दरअसल हरिदास को कहीं से मालूम चला था कि सोलन और बिलासपुर के आपस में लगते इलाके की मिट्टी खनिजों से भरपूर है। उस मिट्टी का क्या इस्तेमाल हो सकता है, शायद उन्हें नहीं मालूम था। लेकिन आज इस क्षेत्र में सीमेंट के कई प्लांट लगे हुए हैं। ये हरिदास कोई और नहीं, रुमित सिंह ठाकुर के दादा थे। जी हां, उन्हीं रुमित सिंह ठाकुर के जो ‘सवर्ण आयोग’ के गठन की मांग को लेकर पिछले एक साल से सुर्खियों में हैं।

रुमित सिंह ठाकुर सामान्य वर्ग से संबंध रखने वाले लोगों के लिए ‘सवर्ण आयोग’ बनाने की मांग करने वाले प्रमुख चेहरों में से एक हैं। सवर्ण आयोग की मांग को लेकर उनके साथियों ने प्रदेश भर में कई आयोजन किए, धरने दिए, रैलियां की, यात्राएं निकालीं और फिर धर्मशाला में विधानसभा का घेराव किया। नतीजा यह रहा कि प्रदेश सरकार को सामान्य वर्ग आयोग का गठन करना पड़ा। लेकिन रुमित और उनके सहयोगियों का कहना है कि सरकार ने अपना वादा पूरी तरह नहीं निभाया है। इसलिए वे फिर से 16 मार्च को शिमला आकर विधानसभा का घेराव करना चाहते हैं।

रुमित का कहना है कि ‘सवर्ण’ शब्द अगर असंवैधानिक हैं तो हिमाचल सरकार ने क्यों इसी नाम से एक सोसाइटी पंजीकृत कर ली है। लेकिन रुमित भूल गए कि उन्होंने जो सोसाइटी बनाई है, उसमें ‘स्वर्ण (Gold)’ शब्द है, न कि ‘सवर्ण’। वैसे हिमाचल में ‘सवर्ण आयोग’ मांग रहे लोग और कई सारे पत्रकार भी ‘सवर्ण’ को ‘स्वर्ण’ की बोलते और लिखते आ रहे हैं। सवर्ण और अवर्ण जैसे शब्द अमर्यादित माने जाते हैं क्योंकि वर्ण के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। जबकि स्वर्ण यानी सोना मान्य शब्द है। लेकिन न तो पत्रकार इस संबंध में रुमित से सवाल कर रहे हैं और न ही वह खुद कुछ सुनना चाहते हैं।

राजनीतिक महत्वाकांक्षा
आयोग का गठन हो जाने के बाद भी संतुष्ट न होने और विधानसभा के घेराव की बात करने में राजनीतिक विश्लेषक रुमित की राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी देख रहे हैं। उनका मानना है कि कांग्रेस पृष्ठभूमि वाले परिवार से संबंध रखने वाले रुमित ने शुरू से ही पूरी योजना बनाकर इस आयोग की मांग उठाई क्योंकि वो जानते थे कि यह ऐसा विषय है जिस पर बैठे बिठाए समर्थन मिल जाएगा। रुमित जानते थे कि आरक्षण विरोधी और खुद को जाति के आधार पर श्रेष्ठ मानने वालों की एक बड़ी फौज है जो स्वत: ही उनका समर्थन करने लगेगी। हुआ भी यही। डेढ़ साल पहले अचानक सोशल मीडिया पर सवर्ण आयोग के पक्ष में एक माहौल सा बन गया। धीरे-धीरे यह माहौल सोशल मीडिया से निकलकर जमीन पर भी दिखने लगा। कांग्रेस विधायक विक्रमादित्य सिंह का समर्थन मिलने के बाद सवर्ण आयोग ऐसा विषय बन गया जिस पर हर अखबार में खबरें छपने लगीं, जिस पर हर शाम को पत्रकार लाइव अपडेट देने लगे।

हालांकि, समाज का एक वर्ग ऐसा भी था जो पूछ रहा था कि तथाकथित सवर्ण आयोग बनने से क्या हासिल होगा? अगर रुमित और उनके साथियों की आपत्ति आरक्षण और अन्य कानूनों से है तो ये केन्द्र के विषय हैं, राज्य के नहीं। न तो सवर्ण आयोग बनने से आरक्षण खत्म होने वाला है, न ही कोई अन्य कानून खत्म होने वाले हैं। तो फिर राज्य में सवर्ण आयोग बनाने का लॉजिक क्या है? वे लोग मध्य प्रदेश का हवाला देते रहे कि वहां सवर्ण आयोग बनाया गया है। लेकिन वे भूल गए कि यह आयोग वहां पहले से ही था और उसका नाम ‘सामान्य पिछड़ा वर्ग आयोग’ है। यानी उन लोगों के लिए बना आयोग जो सामान्य वर्ग हैं लेकिन पिछड़े हुए हैं। अगर इस तरह की मांग रुमित और उनके साथियों ने की होती तो बात ही कुछ और होती। लेकिन रुमित के भाषणों और उनके साथियों के बयानों में खुद को लेकर जातिवादी दंभ, श्रेष्ठता और अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों प्रति नफरत की भावना स्पष्ट होती है।

आयोग का माहौल जिंदा रखने की कोशिश
रुमित की हर बात, हर कदम एक रणनीति का हिस्सा था, लेकिन अभी वह पूरी तरह सफल नहीं हुए हैं। जब से सरकार ने सवर्ण आयोग का गठन किया है, रुमित और उनके साथी सोशल मीडिया और मीडिया से गायब से हो गए हैं। इसलिए वह चाहते हैं कि सवर्ण आयोग को लेकर बात होती रहे और इस बहाने वह भी चर्चा में बने रहे। रुमित को सबसे ज्यादा फायदा तभी होगा जब इस तरह का माहौल चुनावों तक यानी इस साल के आखिर तक बना रहे। माना जा रहा है कि उनका लक्ष्य अर्की से चुनाव लड़ना है।

कुछ लोगों का मानना है कि रुमित को यह लगता था कि कांग्रेस के कमजोर होने के कारण अर्की उपचुनाव में भाजपा की जीत होगी और 2022 के चुनावों में वह कांग्रेस से टिकट के दावेदार हो जाएंगे। मगर हुआ यह कि कांग्रेस के संजय अवस्थी ने उपचुनाव जीत लिया। अब 2022 में भी कांग्रेस की ओर से उनका टिकट पक्का है। योजना पर पानी फिरता देख उपचुनावों के बाद रुमित ने आंदोलन को तेज किया। उन्हें लगता होगा कि अब तक इस मांग को नजरअंदाज कर रही सरकार आगे भी नहीं मानेगी और वह माहौल बनाते रहेंगे। लेकिन जब धर्मशाला में विधानसभा सत्र के दौरान सरकार ने इस मांग को माना और बजट सत्र से पहले आयोग भी बना दिया परिस्थितियां बदल गईं। अब रुमित कह रहे हैं कि इस आयोग का नाम सवर्ण आयोग होना चाहिए, सामान्य आयोग नहीं।

हालांकि, इस तरह की मांगों के कारण ही पिछले कुछ समय से रुमित और उनके साथियों को मिल रहा समर्थन कम हुआ है। कुछ लोग यह भी कहने लगे हैं कि रुमित को आयोग का गठन चाहिए था या फिर अपने लिए आयोग का गठन चाहिए। उन्हें लगता है कि रुमित चाहते हैं कि सरकार आयोग बनाए तो उसकी अहम जिम्मेदारी भी उन्हें ही दे। इसी कारण धीरे-धीरे लोगों के बीच उनका समर्थन कम हुआ है। अब शिमला चलो को लेकर उनकी मांग को भी पहले की तरह तवज्जो नहीं मिल रही। अब 16 मार्च को शिमला में क्या होगा, कितने लोग आएंगे, इससे भी पता चलेगा कि राजनीति में प्रवेश की योजना रुमित ने अपने लिए बनाई थी, वह सिरे चढ़ेगी या नहीं।